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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

ममता बनर्जी और विपक्ष

 

ममता बनर्जी का दिल्ली आना और विपक्ष के एकीकरण की कोशिश करना कितना सार्थक होगा यह तो समय बताएगा लेकिन यहाँ पर आकर उनके द्वारा सबसे पहले प्रधानमंत्री से मिलना और बंगाल का नाम बदलने का अनुरोध करना साथ ही अन्य मांग करना पुष्टि करता है कि उनको समझ आया होगा कि नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री मानना पड़ा और मांगने के लिए जाना ही पड़ा, इसके पहले वो उनको प्रधानमंत्री मानने से इंकार कर चुकी है

ममता बनर्जी ने दिल्ली आकर कांग्रेस के सोनिया, राहुल के साथ साथ कांग्रेस के उस धड़े से भी मुलाक़ात किया जिसको जी-23 के नाम से जाना जाता है जो कांग्रेस मे लोकतंत्र समर्थक है और परिवार से मुक्ति चाहता है जिसको राहुल गाँधी गद्दार और मोदी से डरने वाले और अन्य उपनाम दे चुके है पवार से भी ममता ने मुलाक़ात किया साथ ही लालू यादव, समाजवादी पार्टी के नेताओं से भी मुलाक़ात किया, ऐसा ही एक समय महत्त्वकांक्षा पाले हुए आंध्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री नायडू ने भी किया था सारे विपक्षी नेताओं से मुलाक़ात कर उनको एक कर तीसरा मोर्चा बना रहे थे जो कभी फलिभूत होकर धरातल पर नहीं दिखा.

वास्तव मे विपक्षी नेताओं को देखा जाय तो उनकी अगर राज्य वार हैसियत और मोदी के समक्ष खड़े होने की व्यक्तित्व की तुलना किया जाय तो दशांश भी नहीं ठहरते है क्योंकि जो विपक्ष के नेता है उनका जो मूल स्वभाव है और महत्त्वकांक्षा है उसको छोड़ पाएंगे ऐसा उनका इतिहास तो नहीं बताता है कहने का तात्पर्य है की स्वाभाविक मित्रता और स्वार्थ, भय की मित्रता मे फर्क होता है क्योंकि स्वाभाविक मित्रता मे स्थायी भाव के साथ साथ त्याग, सम्मान की भावना होती है वहीँ दूसरी तरफ स्वार्थ की मित्रता मे मे अस्थायी भाव के साथ अपने हितो की वरीयता और छल का भी भाव होता है जिसको हम सबने समय समय पर आजादी से लेकर अभी तक देखा है क्या आज की परिस्थिति मे विपक्ष के नेताओं मे इतना साहस हो सकता है अपने विशाक्त स्वभाव को छोड़कर त्याग और समर्पण किसी नेता के प्रति दिखाएंगे यह सब समय बताएगा किन्तु हम तो उनके पूर्व के इतिहास और मूल स्वभाव को आधार बना कर ही विश्लेषण करेंगे......


क्रमशः


     TBV

 Naveen Pandey

ममता बनर्जी की दिल्ली प्रवास(चौबे जी दुबे बने )

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